Monday, May 19, 2008
सोरों तुलसीदास की जन्मस्थली
Sunday, May 18, 2008
सोरों तीर्थ
सोरों एक क़स्बा और अब एक तहसील भर नहीं है। दरअसल एटा जिले से कासगंज को अलग कर जिला बनाने के साथ सोरों को तहसील बनाने कि घोषणा कि गई है। लेकिन सोरों सरकार कि इस पहचान का मोहताज नहीं है।सोरों कि पहचान एक तीर्थ के रूप में है। ऐसा तीर्थ जो जिसका महात्म्य पृथ्वी कि उत्त्पति से जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वराह का रूप धरकर पृथ्वी को इसी स्थान पर पाताल लोक से बाहर निकालकर आकाश में स्थापित किया था। पाताल लोक के स्वामी हिरान्यक्झ का वध कर मार्गशीर्ष माह के द्वादशी को निर्वाण प्राप्त किया था। तब से इस माह के इसी दिन मेला लगता है। जो सोरों के हरिपदी के पास के मैदान में लगता है। हरपदी को सोरों कुंड के नाम से भी जानते हैं। जहाँ गंगा का जल एक नहर जरिये आता है। बहुत पहले भागीरथी गंगा यहीं से होकर बहती थी। अब भागीरथी सोरों से ८ किलोमीटर उत्तर की ओर बहती है। सोरों मुख्य रूप से अस्थि विसर्जन के विख्यात है। ऐसा पुराणों में कहा गया है कि सोरों हरिपदी गंगा में अस्थि विसर्जन से वह तीन दिन में रेणू रूप हो जाती है। ऐसा महात्म्य और किसी पुराण बारे में सुनने को नहीं मिलता। यह शोध का रोचक विषय है कि आज जब सोरों कुंड से गंगा प्रवाहित नहीं होती और एक नहर के जरिये कुंड में गंगा का पानी आता है और समय-समय पर उसे दूसरे रास्ते से निकाल दिया जाता है। फिर लोंगों का सोरों कुंड में अस्थि विसर्जन का वही विश्वास है, जो प्राचीन समय में हुआ करता था। यही नहीं पूर्वजों के पिंडदान के लिए इसे आदि गया का दर्जा दिया गया है। यही एक तीर्थ है, जहाँ pure sal पिंडदान किया ja sakata है। जबकि गया समेत अन्य tirton में केवल pitra pakghh में ही पिंडदान kia ja sakata है। इस तरह यह तीर्थ कई mayane में mahattv rakhata है। khaskar tulasidas के जन्म स्थल के रूप में isaki jankari kafi jarururi है.