Monday, May 19, 2008

सोरों तुलसीदास की जन्मस्थली

सोरों तुलसीदास की जन्मस्थली है। इसके काफी प्रमाण हैं। सबसे पहले उनके योगमर्ग मुहल्ले में खंडहर घर कि चर्चा की जा चुकी है। अब चर्चा उनके ससुराल की। जो उनके घर के पश्चिम में स्थित बदरिया गाँव में है। ये गाँव कुंड से महज एक किलोमीटर की दुरी पर है। जब सोरों से गंगा जी होकर बहती थी तो तुलसी नदी पारकर इसी गाँव में गए थे। जिसका जिक्र कई ग्रंथो में मिलता है। उनका ये पत्नी प्रेम था जो बाढ में भी नदी पर कर गए थे। उनका पैतृक गाँव कहा जाने वाला रामपुर अब श्यामपुर के नाम से जाना जाता है। उनके चचेरे भाई ने अपनी कृष्ण भक्ति के चलते उसका नाम बदल दिया। यहीं से उनका परिवार सोरों के योगमार्ग मुहल्ले में आकर बसा था। जो वास्तव में तुलसी के पिता आत्माराम के नाना का घर था। जो राजौरी ब्राहमण थे। उनके वंश में किसी के न होने से वह आत्माराम का हो गया। जहाँ उनकी माँ अपनी छोटी बहु के कलह से तंग होकर आई । यहीं पर हुलसी ने तुलसी को जन्म दिया।
चलिए बात करते हैं सोरों के एक और कहानी की। ये कहानी है तुलसीदास की। जी हाँ रामचरित मानस वाले अपने कवि तुलसीदास जी। मैंने बहुत पहले पढा था कि तुलसीदास का जन्म चित्रकूट के पास बांदा जिले के राजापुरगाँव में हुआ था। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजापुर ख़ुद तुलसीदास ने बसाया था। दरअसल तुलसीदास का जन्म सोरों के योगमार्ग मुहल्ले में हुआ था। जहाँ उनके घर का खँडहर आज भी मौजूद है।

Sunday, May 18, 2008

सोरों तीर्थ

सोरों एक क़स्बा और अब एक तहसील भर नहीं है। दरअसल एटा जिले से कासगंज को अलग कर जिला बनाने के साथ सोरों को तहसील बनाने कि घोषणा कि गई है। लेकिन सोरों सरकार कि इस पहचान का मोहताज नहीं है।सोरों कि पहचान एक तीर्थ के रूप में है। ऐसा तीर्थ जो जिसका महात्म्य पृथ्वी कि उत्त्पति से जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वराह का रूप धरकर पृथ्वी को इसी स्थान पर पाताल लोक से बाहर निकालकर आकाश में स्थापित किया था। पाताल लोक के स्वामी हिरान्यक्झ का वध कर मार्गशीर्ष माह के द्वादशी को निर्वाण प्राप्त किया था। तब से इस माह के इसी दिन मेला लगता है। जो सोरों के हरिपदी के पास के मैदान में लगता है। हरपदी को सोरों कुंड के नाम से भी जानते हैं। जहाँ गंगा का जल एक नहर जरिये आता है। बहुत पहले भागीरथी गंगा यहीं से होकर बहती थी। अब भागीरथी सोरों से ८ किलोमीटर उत्तर की ओर बहती है। सोरों मुख्य रूप से अस्थि विसर्जन के विख्यात है। ऐसा पुराणों में कहा गया है कि सोरों हरिपदी गंगा में अस्थि विसर्जन से वह तीन दिन में रेणू रूप हो जाती है। ऐसा महात्म्य और किसी पुराण बारे में सुनने को नहीं मिलता। यह शोध का रोचक विषय है कि आज जब सोरों कुंड से गंगा प्रवाहित नहीं होती और एक नहर के जरिये कुंड में गंगा का पानी आता है और समय-समय पर उसे दूसरे रास्ते से निकाल दिया जाता है। फिर लोंगों का सोरों कुंड में अस्थि विसर्जन का वही विश्वास है, जो प्राचीन समय में हुआ करता था। यही नहीं पूर्वजों के पिंडदान के लिए इसे आदि गया का दर्जा दिया गया है। यही एक तीर्थ है, जहाँ pure sal पिंडदान किया ja sakata है। जबकि गया समेत अन्य tirton में केवल pitra pakghh में ही पिंडदान kia ja sakata है। इस तरह यह तीर्थ कई mayane में mahattv rakhata है। khaskar tulasidas के जन्म स्थल के रूप में isaki jankari kafi jarururi है.